Bina aahar ke moksh jaane wale muni
जैन धर्म के अनुसार, मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम, तपस्या, और अहिंसा का पालन आवश्यक है। मुनि (जैन साधु) कठोर व्रत और तप का पालन करते हैं, जिसमें आहार का भी विशेष स्थान है। कई मुनि अत्यंत अल्प आहार ग्रहण करते हैं, और कुछ विशेष तपस्याओं में अन्न-जल का पूर्ण त्याग भी करते हैं (जिसे संलेखना या संथारा कहा जाता है)।
संथारा या संलेखना के अंतर्गत मुनि धीरे-धीरे आहार और जल का त्याग करते हैं, और अंततः शरीर का परित्याग करते हैं। यह त्याग संयम, वैराग्य और मोक्ष की अभिलाषा का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, जिन्होंने संपूर्ण संयम, राग-द्वेष का क्षय, और सच्चा आत्मज्ञान पाया है, वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
जैन आगमों में कई ऐसे मुनियों का उल्लेख है जिन्होंने संलेखना द्वारा शरीर का त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया — जैसे कि भगवान महावीर स्वामी ने भी अंतिम दिनों में अत्यंत अल्प आहार लेकर अंत में केवल जल का त्याग कर केवलज्ञान और मोक्ष प्राप्त किया।
सारांश: जैन धर्म में कुछ मुनि बिना आहार (संथारा या संलेखना द्वारा) शरीर का त्याग कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं, यदि वे पूर्ण संयम, तप और सम्यक ज्ञान में स्थित होते हैं।