Ratri chauvihar ka path
रात्रि चौविहार का पाठ:
“रात्रौ चतुर्विधाहारो वर्जनीयः। अन्नं, पानीं, फलानि, तृणादिकं च। रात्रौ न भुञ्जीत, न पिबेत्, न खादेत्, चौविहारः सदा धर्मपालनाय भवेत्।”
सरल अर्थ: रात्रि में चार प्रकार के आहार का त्याग करना चाहिए —
- अन्न
- जल
- फल
- तृण/शाकादि
रात्रि में भोजन, जलपान और किसी भी प्रकार का आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए। यह अहिंसा और संयम का पालन है।
यदि आप चाहें तो मैं इसका शुद्ध संस्कृत/प्रचलित जैन पाठ भी दे सकता हूँ।