आप जो निर्ग्रन्थ बता रहे है वैसे तो जैनेतर भी हो सकता है क्या सही है?
हाँ, शब्दार्थ की दृष्टि से “निर्ग्रन्थ” का अर्थ है जिसके पास ग्रन्थि, यानी मोह और परिग्रह का बंधन न हो। इस अर्थ में यह शब्द सामान्य रूप से किसी भी विरक्त, त्यागी साधक के लिए बोला जा सकता है।
लेकिन जैन परंपरा में “निर्ग्रन्थ” शब्द का विशेष और प्रामाणिक प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण है:
- यह मुख्यतः वीतराग, परिग्रह-रहित जैन साधु के लिए प्रयुक्त होता है।
- तीर्थंकरों को भी “निर्ग्रन्थ” कहा गया है, क्योंकि वे पूर्णतया मोह-परिग्रह से मुक्त हैं।
- इसलिए जैन संदर्भ में “निर्ग्रन्थ” कहना केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र से युक्त साधना को भी सूचित करता है।
अतः निष्कर्ष:
- सामान्य भाषा में निर्ग्रन्थ जैनेतर भी कहा जा सकता है।
- जैन शास्त्रीय और धार्मिक अर्थ में “निर्ग्रन्थ” का प्रयोग विशेषतः जैन साधु/वीतराग पुरुष के लिए ही अधिक उचित है।
इसलिए यदि कोई केवल वस्त्र-त्याग या बाहरी वैराग्य के आधार पर “निर्ग्रन्थ” कहलाए, तो जैन दृष्टि से वह पूर्ण अर्थ में निर्ग्रन्थ नहीं माना जाएगा, जब तक राग-द्वेष और परिग्रह का भी क्षय न हो।