जैन धर्म मुख्य दो शाखाओं में क्यों विभाजित हो गया जब दोनों का लक्ष्य तो एक ही है?
जैन धर्म मुख्यतः दिगम्बर और श्वेताम्बर इन दो परंपराओं में ऐतिहासिक कारणों से विभाजित हुआ। लक्ष्य दोनों का एक ही है — मोक्ष, कर्म-निर्मूलन, अहिंसा, संयम, और आत्मशुद्धि।
विभाजन क्यों हुआ?
मुख्यतः आचार, परंपरा, और शास्त्रीय व्याख्या के कुछ भेदों के कारण:- मुनि-आचार में भिन्नता
समय के साथ साधु-जीवन की नियम-पालना को लेकर अलग-अलग परंपराएँ विकसित हुईं। दिगम्बर परंपरा में पूर्ण अपरिग्रह और वस्त्र-त्याग पर बल है। श्वेताम्बर परंपरा में साधु-साध्वियों के लिए श्वेत वस्त्र परंपरा बनी रही।
- शास्त्र-परंपरा का अंतर
दोनों संप्रदायों में आगमों और उनके संरक्षण की परंपरा अलग-अलग रूप में विकसित हुई। इसलिए ग्रंथों की संख्या, स्वीकार्यता और व्याख्या में भेद दिखने लगे।
- ऐतिहासिक परिस्थितियाँ
कालांतर में साधु-संघों, राजकीय परिस्थितियों, और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण अलग-अलग आचार-प्रवाह मजबूत हुए।
क्या इससे धर्म का मूल बदल गया?
नहीं। जैन धर्म का मूल सिद्धांत दोनों में समान है:- अहिंसा
- सत्य
- अस्तेय
- ब्रह्मचर्य
- अपरिग्रह
- कर्म सिद्धांत
- आत्मा की शुद्धि
- मोक्ष-मार्ग
अंतर मार्ग की बाहरी अभिव्यक्ति में है, लक्ष्य में नहीं।