द्रव्य कर्म और भावकर्म क्या है
जैन दर्शन में द्रव्यकर्म और भावकर्म का भेद बहुत महत्वपूर्ण है।
1) द्रव्यकर्म क्या है?
द्रव्यकर्म वह पुद्गल कर्म-वर्गणा है जो आत्मा के साथ बंधकर कर्म रूप में रहती है। यह पदार्थ रूप है, यानी भौतिक कर्म।- यह सूक्ष्म पुद्गल है।
- आत्मा के साथ बंधकर ज्ञान, दर्शन, वेदनीय, मोहनीय आदि कर्मों के रूप में फल देता है।
- इसे कर्म-परमाणु या कर्म-शरीर से संबंधित माना जाता है।
2) भावकर्म क्या है?
भावकर्म आत्मा के अंदर उत्पन्न होने वाली आत्मिक अवस्था है, जैसे:- राग
- द्वेष
- मोह
- क्रोध
- मान
- माया
- लोभ
यह मानसिक-आध्यात्मिक भाव है, जो आत्मा को कर्म बंधन की ओर ले जाता है।
सरल भाषा में अंतर
- भावकर्म = आत्मा का आंतरिक भाव
- द्रव्यकर्म = उस भाव के कारण बंधा हुआ सूक्ष्म कर्म-पुद्गल
संबंध
भावकर्म के कारण द्रव्यकर्म का बंध होता है। अर्थात:कषाय और योग से भावकर्म होता है → उसी से द्रव्यकर्म का बंध होता है।
उदाहरण
अगर किसी के मन में क्रोध आया:- वह क्रोध का भाव = भावकर्म
- उसी क्रोध के कारण जो कर्म-पुद्गल आत्मा से बंधा = द्रव्यकर्म
संक्षेप
- भावकर्म = आत्मा की दूषित अवस्था
- द्रव्यकर्म = आत्मा से बंधा हुआ कर्म-पुद्गल
यदि चाहें, मैं आठ कर्मों के साथ द्रव्यकर्म और भावकर्म का संबंध भी सरल रूप में समझा सकता हूँ।