भावकर्म चेतन है या अचेतन
भावकर्म चेतन है।
जैन दर्शन में कर्म के दो पक्ष बताए जाते हैं:
- द्रव्यकर्म — यह पुद्गल है, इसलिए अचेतन है।
- भावकर्म — यह जीव की अंतःपरिणति / मानसिक-आत्मिक अवस्था है, इसलिए चेतन है।
सरल शब्दों में:
- भावकर्म = आत्मा के भीतर होने वाला राग, द्वेष, मोह, कषाय आदि का भावात्मक परिणाम
- इसलिए यह जीव से संबंधित चेतन भाव है
- जबकि उसका भौतिक रूप द्रव्यकर्म अचेतन होता है
अर्थात: भावकर्म चेतन है, द्रव्यकर्म अचेतन।