राग द्वेष आदि अशुद्ध भाव आत्मा में क्यों उत्पन्न होते है
राग, द्वेष आदि अशुद्ध भाव आत्मा में मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग के कारण उत्पन्न होते हैं।
सरल रूप में समझें:
- मिथ्यात्व से आत्मा को सही ज्ञान नहीं रहता।
- इन्द्रिय विषयों में आसक्ति होने से राग पैदा होता है।
- अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ होने पर द्वेष उत्पन्न होता है।
- क्रोध, मान, माया, लोभ जैसे कषाय अशुद्ध भावों को बढ़ाते हैं।
- जब आत्मा कर्मों के बंधन में रहती है, तब शुद्ध स्वभाव ढक जाता है और अशुद्ध भाव प्रकट होते हैं।
जैन दृष्टि से, आत्मा का मूल स्वभाव ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य है। राग-द्वेष आत्मा का स्वभाव नहीं, बल्कि कर्म-जनित विकार हैं।
अतः अशुद्ध भाव इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि:
- आत्मा पर कर्मों का आवरण है,
- अज्ञान है,
- विषयों में आसक्ति है,
- और कषायों का उदय होता है।
इनका उपाय है:
- सम्यक दर्शन
- सम्यक ज्ञान
- सम्यक चारित्र
- संयम
- ध्यान
- कषायों का क्षय और उपशम
जब आत्मा शुद्ध साधना में स्थित होती है, तब राग-द्वेष कम होते जाते हैं और अंततः नष्ट होते हैं।