Satsoo munirajo k upsarg ka karan kon bane
जैन धर्म के अनुसार, सच्चे मुनिराज (सत्सू मुनिराज) को जो उपसर्ग (कष्ट, विघ्न या उत्पीड़न) होता है, उसका मुख्य कारण जीवों के अपने कर्म होते हैं। विशेष रूप से, यह उनके पूर्व जन्मों के अशुभ कर्मों के उदय के कारण होता है। जब मुनिराज आत्मसाधना, संयम और तपस्या में लीन रहते हैं, तो उनके शुभ कर्मों के फलस्वरूप वे उपसर्गों का धैर्यपूर्वक सामना करते हैं।
इसके अतिरिक्त, जैन धर्मग्रंथों में यह भी बताया गया है कि कभी-कभी देव, मनुष्य या असुरी प्रवृत्ति वाले जीव अज्ञानवश या द्वेषवश मुनिराज को कष्ट पहुंचाते हैं; जैसे कि भगवान महावीर को गोपल, चंडकौशिक, संख आदि के द्वारा उपसर्ग हुए। लेकिन वास्तविक कारण तो आत्मा के कर्म ही हैं।
सारांश में, सत्सू मुनिराज के उपसर्ग का मुख्य कारण उनके स्वयं के कर्मों का उदय होता है, यद्यपि बाहरी रूप में अन्य जीव निमित्त बन सकते हैं।