दर्शनावरणीय कर्म क्या है
दर्शनावरणीय कर्म वह कर्म है जो जीव के सम्यक् दर्शन अर्थात् सही श्रद्धा, स्पष्ट बोध और आत्म-तत्त्व के प्रथम अनुभव को ढकता है।
सरल शब्दों में:
- जैसे बादल सूर्य को ढक देते हैं,
- वैसे ही दर्शनावरणीय कर्म आत्मा के दर्शन-गुण को आवृत कर देता है।
इसका प्रभाव
इस कर्म के कारण जीव में:- सत्य का स्पष्ट बोध नहीं होता,
- श्रद्धा में भ्रम रहता है,
- आत्मा के मूल स्वरूप का अनुभव देर से होता है।
यह किस प्रकार का कर्म है?
यह घाती कर्म में आता है, क्योंकि यह आत्मा के ज्ञान-दर्शन से संबंधित गुणों को बाधित करता है।मुख्य बात
जैन दर्शन में आत्मा का स्वभाव दर्शन-ज्ञान-चारित्र है। दर्शनावरणीय कर्म इन गुणों में विशेष रूप से दर्शन को आच्छादित करता है।यदि चाहें, मैं इसके भेद, उदय-उपशम-क्षय और दर्शनावरणीय कर्म के उपभेद भी सरल भाषा में बता सकता हूँ।