सब कर्म का मूल अज्ञान और मिथ्यात्व है?
हाँ, जैन दर्शन के अनुसार कर्म-बंधन का मुख्य मूल कारण अज्ञान और मिथ्यात्व माना गया है।
संक्षेप में अर्थ:
- मिथ्यात्व = तत्त्वों का उल्टा या भ्रमित ज्ञान, जैसे आत्मा-अनात्मा, पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष का ठीक बोध न होना।
- अज्ञान = यथार्थ स्वरूप को न जानना।
- इसी कारण राग-द्वेष, कषाय, प्रमाद और अविवेक उत्पन्न होते हैं।
- इन्हीं से आस्रव होता है, और फिर कर्म का बंध होता है।
जैन दृष्टि से
- केवल बाहरी क्रिया से नहीं, बल्कि मिथ्यात्वयुक्त भाव से कर्म ज्यादा गहरा बंधता है।
- इसलिए सम्यक् दर्शन का उदय बहुत महत्वपूर्ण है।
- जब मिथ्यात्व दूर होता है, तब साधक मोक्षमार्ग की ओर बढ़ता है।
सरल निष्कर्ष:
- हाँ, कर्म-बंधन का मूल कारण मिथ्यात्व और अज्ञान ही है।
- और इनके साथ जुड़ी हुई कषायें उस बंध को और मजबूत करती हैं।
अगर चाहें, मैं इसे आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा के क्रम में भी समझा सकता हूँ।