जगत का स्वरूप क्या है
जैन धर्म के अनुसार जगत का स्वरूप अनादि-अनंत है। यह किसी ने बनाया नहीं है और कभी पूर्णतः नष्ट भी नहीं होता। जगत स्वतः अस्तित्व में रहने वाला है।
संक्षेप में जगत का स्वरूप
- जगत शाश्वत है — न इसकी उत्पत्ति होती है, न पूर्ण विनाश।
- यह जीव और अजीव से बना है।
- अजीव में पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश, काल आते हैं।
- जीव अनेक हैं और हर जीव स्वतंत्र चेतन सत्ता है।
- यह संसार कर्मों के बंधन से चलता है।
- जीव अपने कर्मों के कारण गति, स्थिति, जन्म-मरण में आता-जाता रहता है।
- मोक्ष प्राप्त होने पर जीव संसार से मुक्त होकर सिद्ध अवस्था को प्राप्त करता है।
जैन दृष्टि से विशेष बात
जगत किसी एक ईश्वर की रचना नहीं है। यह स्वभाव से चलता है — उत्पत्ति, स्थिति, परिवर्तन और विनाश के नियमों के अनुसार।लोक का स्वरूप
जैन शास्त्रों में जगत को मुख्यतः लोक और अलोक में समझाया गया है:- लोक: जहाँ जीव, पुद्गल आदि हैं।
- अलोक: लोक के बाहर का शून्य प्रदेश, जहाँ कोई द्रव्य नहीं है।