प्रत्येक जीव का जगत अलग अलग होता है?
हाँ, जैन दृष्टि से प्रत्येक जीव का अनुभूत जगत अलग-अलग होता है।
सरल अर्थ में:
- बाह्य द्रव्यलोक एक ही है।
- लेकिन हर जीव की ज्ञान-शक्ति, कर्मबन्ध, इन्द्रियाँ, विचार, और अनुभूति अलग होती है।
- इसलिए जो संसार एक जीव को जैसा दिखता, लगता, और अनुभव होता है, वैसा दूसरे जीव को नहीं होता।
जैसे:
- मनुष्य, पशु, देव, नारकी — सबकी अनुभूति अलग है।
- एक ही वस्तु को दो जीव अपनी-अपनी कर्मावस्था के अनुसार अलग तरह से देखते हैं।
- इस कारण जैन धर्म में कहा जाता है कि जीव का जगत उसकी दृष्टि और कर्मों से निर्मित होता है।
इसे जैन भाव में ऐसे समझ सकते हैं:
- द्रव्य एक
- पर्याय अनेक
- अनुभव भिन्न-भिन्न
अर्थात् संसार एक ही है, पर हर जीव का “दिखने वाला संसार” और “भोगा हुआ संसार” अलग होता है।
यदि चाहें तो मैं इसे नयवाद, अनेकांतवाद, या कर्म सिद्धांत के आधार पर और सरल रूप में भी समझा सकता हूँ।