क्या जीव खुद अपने जगत को उत्पन्न करता है?
जैन दर्शन के अनुसार जीव स्वयं अपने अनुभव-जगत का निर्माण करता है, लेकिन बाह्य जगत का पूर्ण स्रष्टा नहीं है।
सरल शब्दों में:
- जीव अपनी कर्म-बंधन के कारण सुख, दुःख, राग, द्वेष, भय, मोह आदि का अनुभव करता है।
- इसलिए जो “मेरा संसार” हमें दिखता है, वह बहुत हद तक अपने कर्मों और दृष्टि से निर्मित अनुभव-जगत होता है।
- लेकिन द्रव्य रूप से संसार, पुद्गल, काल, आकाश, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और जीव — ये अनादि-अनंत माने गए हैं; इन्हें जीव ने उत्पन्न नहीं किया।
- अर्थात जीव अपने अनुभव और बंधन का कारण स्वयं बनता है, पर संपूर्ण जगत का रचयिता नहीं।
जैन दृष्टि से:
- कर्म का कर्ता जीव है।
- कर्म-फल का भोक्ता भी जीव है।
- उसी के अनुसार उसका संसारिक अनुभव बनता है।
इसलिए उत्तर होगा:
हाँ, जीव अपने अनुभव-रूपी जगत को कर्मों के द्वारा स्वयं बनाता है; लेकिन नहीं, वह संपूर्ण विश्व का निर्माता नहीं है।