जब अलोक में कुछ भी नहीं है तो उसका अस्तित्व क्यों है?
जैन दर्शन के अनुसार अलोक का अस्तित्व इसलिए है क्योंकि लोक की सीमा को परिभाषित करने के लिए उसका होना आवश्यक है।
संक्षेप में:
- लोक वह क्षेत्र है जहाँ धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय हैं, इसलिए जीव, पुद्गल, गति, स्थिति आदि की क्रियाएँ वहाँ संभव होती हैं।
- अलोक उसके बाहर का अनंत शून्य-सा क्षेत्र है, जहाँ:
फिर भी अलोक “कुछ नहीं” होने पर भी है, क्योंकि जैन दर्शन में अस्तित्व को केवल पदार्थों की उपस्थिति से नहीं, बल्कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के आधार पर समझा जाता है। अलोक एक आकाश का ही भाग है। यानी:
- आकाशद्रव्य अनंत है
- उसका एक भाग लोक
- और शेष भाग अलोक कहलाता है
इसलिए अलोक का अस्तित्व अभाव के रूप में नहीं, बल्कि आकाश के उस क्षेत्र के रूप में है जहाँ कोई जीव-पुद्गल आदि नहीं रहते।
सरल उदाहरण: जैसे एक कमरे में सामान है और दूसरे हिस्से में खाली जगह है — खाली जगह का भी अपना स्थान होता है। वैसे ही लोक में जीव और पदार्थ हैं, और अलोक में उनका अभाव है; फिर भी वह आकाश का वास्तविक भाग है।
जैन दृष्टि से अलोक का मुख्य संदेश यह भी है कि जहाँ गति, कर्म और संसार नहीं है, वहाँ पूर्ण विश्रांति और सीमातीत आकाश का स्वरूप है।