रागादि भाव विभाव है?
हाँ, रागादि भाव विभाव भाव माने जाते हैं।
सरल अर्थ:
- राग = आसक्ति, मोह, प्रियता
- द्वेष = विरोध, घृणा
- कषाय = क्रोध, मान, माया, लोभ
- विभाव भाव = आत्मा के स्वाभाविक शुद्ध भावों से हटकर उत्पन्न होने वाले विकृत भाव
जैन दर्शन में आत्मा का स्वभाव है:
- ज्ञान
- दर्शन
- वीर्य
- आनंद
- समता
जब आत्मा में राग, द्वेष, मोह आदि उठते हैं, तब वे उसकी शुद्ध अवस्था को ढक देते हैं। इसलिए वे विभाव भाव कहलाते हैं।
संक्षेप में:
- शुद्ध भाव = आत्मा के स्वाभाविक, निर्मल भाव
- विभाव भाव = राग, द्वेष, कषाय आदि विकारी भाव
इसलिए रागादि भाव विभाव हैं। इन्हें छोड़कर समता, वीतरागता और शुद्ध उपयोग की ओर बढ़ना जैन साधना का लक्ष्य है।