कामुकता भाव क्या होता है
जैन दृष्टि में कामुकता भाव का अर्थ है इन्द्रिय-विषयों के प्रति तीव्र आकर्षण, भोग-इच्छा और वासना-प्रधान मनोभाव। यह विशेषकर काम, विषय-सुख, और शरीर-सुख की ओर मन के खिंचाव को दर्शाता है।
सरल अर्थ:
- सुंदर रूप, स्पर्श, रस, गंध, शब्द आदि के प्रति आसक्ति
- भोगों की चाह बढ़ना
- मन का संयम से हटकर विषयों की ओर जाना
- आत्मा के शुद्ध स्वरूप से दूर होना
जैन दृष्टि से इसका प्रभाव:
कामुकता भाव से- राग बढ़ता है
- बंधन बढ़ता है
- अहिंसा, ब्रह्मचर्य और संयम में बाधा आती है
- आत्मकल्याण में रुकावट होती है
जैन साधना में इसका उपाय:
- ब्रह्मचर्य का पालन
- विषयों में अनासक्ति
- स्वाध्याय
- ध्यान
- इन्द्रिय-निग्रह
संक्षेप में, कामुकता भाव वह मानसिक अवस्था है जिसमें मन भोगों और विषय-सुखों में लिप्त हो जाता है। जैन साधना में इसे आत्मा की उन्नति के लिए बाधक माना गया है।