अनंत वीर्य गुण क्या है
अनंत वीर्य गुण जैन दर्शन में आत्मा के आठ कर्म-रहित या प्रकट होने वाले अनंत गुणों में से एक माना जाता है। इसका अर्थ है:
- वीर्य = शक्ति, सामर्थ्य, आत्मबल
- अनंत वीर्य = असीम, अनंत आत्मशक्ति
सरल अर्थ
जब आत्मा कर्मों से मुक्त होती है, तब उसमें अनंत शक्ति प्रकट होती है। यह शक्ति केवल शरीर की नहीं, बल्कि आत्मिक सामर्थ्य है।इसका भाव
अनंत वीर्य का अर्थ यह भी है कि आत्मा में:- अनंत कार्य-क्षमता है
- अनंत आत्मबल है
- अनंत साधना-शक्ति है
- मोक्ष प्राप्त करने की पूर्ण क्षमता है
विशेष बात
संसारी जीव में यह शक्ति कर्मों के कारण आवृत रहती है, इसलिए सीमित रूप में दिखाई देती है। लेकिन सिद्ध अवस्था में आत्मा का अनंत वीर्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है।संक्षेप में
अनंत वीर्य गुण = आत्मा की असीम, शुद्ध, कर्मरहित शक्ति।यदि आप चाहें, तो मैं आठ कर्म-रहित गुणों का भी सरल वर्णन कर सकता हूँ।