आत्मा को अनंत सुख कैसे है
जैन दर्शन के अनुसार आत्मा का स्वभाव ही अनंत सुख है, लेकिन यह सुख अभी कर्मों के आवरण से ढका हुआ है। जब आत्मा मोह, राग-द्वेष, और कर्मबंधन से मुक्त हो जाती है, तब उसका स्वाभाविक अनंत सुख प्रकट होता है।
संक्षेप में:
- आत्मा अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत सुख वाली होती है।
- यह सुख बाहर की वस्तुओं से नहीं, बल्कि अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होने से मिलता है।
- जब कर्म नष्ट होते हैं और आत्मा केवलज्ञानी/सिद्ध अवस्था को प्राप्त करती है, तब उसे अक्षय, निरंतर, निर्बाध सुख मिलता है।
- संसार का सुख क्षणिक है, पर आत्मा का मूल सुख अनंत और अविनाशी है।
इसलिए कहा जाता है कि सुख आत्मा में है, शरीर या पदार्थ में नहीं। आत्मा जब अपने स्वभाव में स्थित होती है, तभी अनंत सुख अनुभव करती है।