History of kareda parshwanath
श्री करेड़ा पार्श्वनाथ एक प्राचीन जैन तीर्थ है, जो राजस्थान के भूपालसागर क्षेत्र में स्थित माना जाता है। यहाँ भगवान पार्श्वनाथ की लगभग 90 सेमी ऊँची काले रंग की पद्मासन प्रतिमा है, जिसके ऊपर नौ फणों वाला सर्प-छत्र बताया गया है। ( jainsite.com)
इसके इतिहास के बारे में प्रचलित विवरणों के अनुसार, मंदिर की प्राचीनता का निश्चित प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन जीर्णोद्धार के समय सं. 55 का एक पुराना स्तम्भ-लेख मिला, जिससे इसे विक्रम संवत से भी पूर्व का माना जाता है। विक्रम संवत 861 में श्री खेेमसिंह शाह ने भव्य मंदिर बनवाया और आचार्य श्री जयानन्दसूरीश्वरजी ने प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। इसके बाद विक्रम संवत 1039 में आचार्य श्री यशोभद्रसूरीश्वरजी द्वारा पुनः प्रतिष्ठा हुई। ( jainsite.com)
आगे चलकर विक्रम संवत 1321 में श्री झाझन्न शाह ने, आचार्य श्री धर्मघोषसूरिजी के संघ के साथ यहाँ रुककर, मंदिर की मरम्मत और जीर्णोद्धार कराया। परंपरा के अनुसार उन्होंने सात-मंजिला मंदिर भी बनवाया था, यद्यपि वह आज विद्यमान नहीं है। बाद में विक्रम संवत 1656 और फिर संवत 2033 में भी जीर्णोद्धार हुआ; अंतिम पुनः प्रतिष्ठा आचार्य श्री सुशीलसूरीश्वरजी के सान्निध्य में संपन्न बताई जाती है। ( jainsite.com)
यह तीर्थ चमत्कारिक और संकट-हरणकारी माना जाता है। यहाँ पावस/पौष कृष्ण दशमी को बड़ा मेला लगता है, और मंदिर में प्राचीन शिलालेख तथा अवशेष भी बताए जाते हैं। जैन ग्रंथों जैसे “तीर्थमाला”, “श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ चंद”, “श्री भटेवा पार्श्वनाथ स्तवन”, “श्री गोदीजी पार्श्वनाथ स्तवन”, “श्री पार्श्वनाथ नाममाला” और “श्री पार्श्वनाथ चैत्यपरिपाटी” में भी इसका उल्लेख बताया गया है। ( jainsite.com)
अगर आप चाहें, तो मैं इसका संक्षिप्त इतिहास, मूर्ति-विशेष, या यात्रा-विवरण अलग से भी बता सकता हूँ।