digambar sampraday ke anusaar bolo, mahavir swami dakshin kyu nahi gye jabki bhadrabahu shrutkevali hi the aur bahut kasht ke bad bhi arydesh chhod kar dharm ka vistaran kar paye. kya pracharan tirthankaron ka nisht kaary nahi hai?
डिगम्बर परम्परा के अनुसार इस विषय को ऐसे समझना चाहिए:
1) तीर्थंकर का मुख्य कार्य “धर्म-प्रवर्तन” है, न कि हर दिशा में स्वयं घूम-घूमकर प्रचार करना। भगवान महावीर का प्रधान कार्य था:
- केवलज्ञान प्राप्त करके धर्म का साक्षात् उपदेश देना,
- चतुर्विध संघ की स्थापना करना,
- और जीवों को मोक्षमार्ग दिखाना।
तीर्थंकर समवसरण में धर्मदेशना देते हैं। उनके उपदेश से गणधर और आचार्य आगे धर्म का विस्तार करते हैं। इसलिए प्रचार होता है, लेकिन उसका रूप तीर्थंकर-केन्द्रित मिशनरी यात्रा जैसा नहीं होता।
2) “महावीर दक्षिण क्यों नहीं गए?” — इसका उत्तर यह है कि तीर्थंकर का विहार कर्म, काल, देश और पात्रता के अनुसार होता है। महावीर स्वामी का विहार मुख्यतः आर्यदेश में रहा, क्योंकि:
- वहाँ उस समय धर्म-श्रवण के योग्य जीव अधिक थे,
- वहाँ संघ की स्थापना और धर्मप्रभावना का आधार था,
- और तीर्थंकर का कार्य किसी एक भूभाग को घेरना नहीं, बल्कि जहाँ धर्म-प्रकाश की योग्यता हो, वहाँ उसका प्रवाह करना है।
3) भद्रबाहु स्वामी का दक्षिण जाना तीर्थंकर-कार्य से भिन्न, पर उसी धर्म-प्रवाह का अंग है। भद्रबाहु श्रुतकेवली थे, और उन्होंने दक्षिण में जाकर:
- संघ की रक्षा की,
- श्रुत का संरक्षण किया,
- तथा दक्षिण भारत में जैन धर्म की जड़ें मजबूत कीं।
यह आचार्य-कार्य है। तीर्थंकर और आचार्य का कार्य समान नहीं होता। तीर्थंकर मार्ग प्रकट करते हैं; आचार्य, उपाध्याय और साधु उस मार्ग को देश-काल के अनुसार फैलाते और सुरक्षित रखते हैं।
4) क्या प्रचार तीर्थंकरों का निष्ठ कार्य नहीं है? हाँ, धर्म-प्रचार तीर्थंकर के कार्य का अंग है, लेकिन जैन दृष्टि में उसका अर्थ यह नहीं कि तीर्थंकर को हर प्रदेश में स्वयं जाकर प्रचार करना ही पड़े। उनका वास्तविक निष्ठ कार्य है:
- सत्य धर्म का प्राकट्य,
- जीवों को मोक्षमार्ग का दान,
- संघ की स्थापना,
- और शाश्वत धर्म की पुनः प्रतिष्ठा।
इसलिए महावीर का दक्षिण न जाना कोई कमी नहीं थी। यह उनके धर्मकार्य की सीमा नहीं, बल्कि उनकी देश-काल-योग्य भूमिका थी।
संक्षेप में:
- महावीर स्वामी = धर्म के मूल प्रवर्तक
- भद्रबाहु स्वामी = उसी धर्म का संरक्षण और विस्तार करने वाले महान आचार्य
- दक्षिण में जाना या न जाना, तीर्थंकर की महत्ता का मापदंड नहीं है; मोक्षमार्ग का उद्घाटन ही तीर्थंकर का सर्वोच्च कार्य है।
यदि चाहो, मैं इस विषय पर डिगम्बर ग्रंथ-आधारित अधिक गहन उत्तर भी दे सकता हूँ।