18 पाप का पच्चक्खाण
18 पाप का पच्चक्खाण का अर्थ है — अठारह पाप-स्थान से मन, वचन, काया द्वारा त्याग / विरति का संकल्प लेना।
18 पाप-स्थान
- प्राणातिपात — हिंसा
- मृषावाद — झूठ
- अदत्तादान — चोरी
- मैथुन — विषय-भोग / ब्रह्मचर्य-भंग
- परिग्रह — संग्रह / लोभ
- क्रोध
- मान — अहंकार
- माया — कपट
- लोभ
- राग
- द्वेष
- कलह — झगड़ा
- अभ्याख्यान — झूठा आरोप
- पैशुन्य — चुगली
- परपरिवाद — दूसरे की निंदा
- रति-अरति — प्रिय-अप्रिय में आसक्ति / द्वेष
- माया-मृषावाद — छलयुक्त झूठ
- मिथ्यात्व — गलत श्रद्धा
संक्षिप्त पच्चक्खाण-भाव
“मैं अठारह पाप-स्थान का त्याग करता/करती हूँ, और यथाशक्ति अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का पालन करूँगा/करूँगी।”यदि आप चाहें, तो मैं इसका शुद्ध प्राकृत/संस्कृत-आधारित पच्चक्खाण पाठ भी दे सकता हूँ।