१७ प्रकार का संयम
१७ प्रकार का संयम जैन परंपरा में इन्द्रियों, मन, वाणी और शरीर को पाप से रोककर धर्म में स्थिर रखने की साधना को कहा जाता है। इसके अनेक वर्गीकरण मिलते हैं; १७ प्रकार का एक प्रचलित वर्गीकरण इस प्रकार समझा जाता है:
- पाँच इन्द्रिय-निग्रह
- स्पर्शन - रसना - घ्राण - चक्षु - श्रोत्र
- चार कषाय-निग्रह
- क्रोध - मान - माया - लोभ
- तीन गुप्ति
- मनोगुप्ति - वचनगुप्ति - कायगुप्ति
- पाँच समिति
- ईर्या समिति - भाषा समिति - एषणा समिति - आदान-निक्षेपण समिति - उत्सर्ग समिति
कुल = 5 + 4 + 3 + 5 = 17
संक्षिप्त अर्थ
- इन्द्रिय-निग्रह: विषयों में आसक्ति न होने देना।
- कषाय-निग्रह: क्रोध आदि विकारों को जीतना।
- गुप्ति: मन, वचन, काय को संयम में रखना।
- समिति: दैनिक व्यवहार में सावधानीपूर्वक अहिंसा का पालन करना।
यदि आप चाहें, तो मैं १७ प्रकार का संयम श्लोक/सूत्र रूप में या बहुत सरल हिंदी में भी बता सकता हूँ।