Push puja ka pura diha
पुष्प पूजा जैन पूजा की अष्टप्रकारी पूजा का एक अंग है। इसमें पुष्प अर्पण करके अनासक्ति, निर्मलता, और भक्ति का भाव रखा जाता है। जैन भाव में यह केवल बाहरी अर्पण नहीं, बल्कि अंतर की शुद्धि का प्रतीक है।
पुष्प पूजा का सरल विधान
- स्नान, शुद्ध वस्त्र, और मन की एकाग्रता के साथ मंदिर जाएँ।
- नवकार मंत्र या नमस्कार मंत्र का स्मरण करें।
- जिनालय में भगवान के समक्ष विनयपूर्वक खड़े होकर भाव शुद्ध रखें।
- निर्दोष, ताज़े, स्वच्छ पुष्प लें।
- पुष्प अर्पण करते समय यह भावना रखें:
- मैं अपने अहंकार को छोड़ रहा/रही हूँ - जैसे पुष्प सुंदर होते हैं, वैसे ही मेरा जीवन भी सुगंधित और पवित्र बने - भगवान के प्रति भक्ति और समर्पण व्यक्त कर रहा/रही हूँ
- पुष्प अर्पण के बाद शांत मन से स्तुति करें।
- अंत में क्षमा-प्रार्थना और प्रणाम करें।
पुष्प पूजा का भावार्थ
- पुष्प = कोमलता, शुद्धता, विनम्रता
- अर्पण = अहंकार का त्याग
- सुगंध = सद्गुणों की महक
- निर्मलता = आत्मा की पवित्रता
महत्वपूर्ण बात
जैन पूजा में भाव सबसे महत्वपूर्ण है। केवल पुष्प चढ़ाने से नहीं, बल्कि अहिंसा, सत्य, संयम, और वैराग्य अपनाने से पूजा पूर्ण मानी जाती है।यदि आप चाहें, तो मैं अष्टप्रकारी पूजा का पूरा क्रम भी लिख सकता हूँ।