Moksh narak aur kya kya janam hote hai ?
जैन धर्म के अनुसार, जीव (आत्मा) संसार में अनेक प्रकार के जन्मों (गति) में भटकता है, जब तक कि वह मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त नहीं कर लेता। मुख्यतः चार प्रकार की गतियाँ (जन्म) मानी गई हैं:
- देव गति (स्वर्ग या देव लोक) – जहाँ आत्मा देव (देवता) रूप में जन्म लेती है।
- मनुष्य गति (मानव जन्म) – जहाँ आत्मा मनुष्य के रूप में जन्म लेती है।
- तिर्यंच गति (पशु, पक्षी, कीट, आदि) – जहाँ आत्मा तिर्यंच (पशु, पक्षी, जीव-जन्तु, आदि) के रूप में जन्म लेती है।
- नरक गति (नरक लोक) – जहाँ आत्मा नरक में कष्ट भोगती है।
इन चार गतियों के अतिरिक्त कोई अन्य जन्म नहीं माने गए हैं। मोक्ष — जब आत्मा सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चारित्र के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का क्षय कर देती है, तब वह मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त कर लेती है। मोक्ष के बाद आत्मा फिर संसार में जन्म नहीं लेती।
सारांश:
- देव जन्म
- मनुष्य जन्म
- तिर्यंच (पशु-पक्षी आदि) जन्म
- नरक जन्म
- मोक्ष (मुक्ति) — जन्म-मरण से परे
यह चार गतियाँ (चौरासी लाख योनियाँ इन्हीं में आती हैं) जैन धर्म के अनुसार मानी जाती हैं।