bandh tatva definition and types in hindi
बंध तत्त्व का अर्थ है आत्मा के साथ कर्मों का बंधना। जब जीव राग, द्वेष, कषाय, मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद आदि के कारण कर्मों को आकर्षित करता है, तब उन कर्मों का आत्मा से जुड़ना बंध कहलाता है।
बंध के प्रकार
जैन दर्शन में बंध को मुख्यतः चार प्रकार से समझाया जाता है:- प्रकृति बंध
- कौन-सा कर्म बंध रहा है, इसका बंध। - जैसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, वेदनीय, आयु, नाम, गोत्र कर्म।
- स्थिति बंध
- कर्म आत्मा से कितने समय तक जुड़े रहेंगे, इसका निर्धारण।
- अनुभाग बंध
- कर्म का फल कितना तीव्र या मंद होगा, इसका निर्धारण।
- प्रदेश बंध
- कितने कर्म-प्रदेश आत्मा से बंधेंगे, इसका निर्धारण।
संक्षेप में
बंध तत्त्व = आत्मा पर कर्मों का आस्रव होकर उनसे जुड़ जाना। इसके चार प्रकार होते हैं: प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश बंध।अगर चाहें, मैं इसे बहुत आसान हिंदी में 2-3 पंक्तियों में भी लिख सकता हूँ।