Explain these karmas in hindi and also add how do we get that particular karma by what activities and how to lose them
नीचे अष्टकर्म (आठ कर्म) का सरल हिंदी में अर्थ, वे कैसे बँधते हैं, और कैसे घटते/छूटते हैं, दिया गया है।
1) ज्ञानावरणीय कर्म
अर्थ: जो आत्मा के ज्ञान को ढक देता है। कैसे बँधता है:- झूठ बोलना
- ज्ञान का अपमान करना
- ज्ञानियों का अनादर करना
- आलस्य, प्रमाद, अज्ञान में जीना
- दूसरों के सीखने में बाधा डालना
कैसे छूटता है:
- स्वाध्याय
- गुरु-सेवा
- विनय
- सत्य, संयम, सावधानी
- ज्ञान के लिए श्रद्धा और परिश्रम
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2) दर्शनावरणीय कर्म
अर्थ: जो सम्यक् दर्शन, श्रद्धा और आत्म-तत्त्व की सही पहचान को ढक देता है। कैसे बँधता है:- सम्यक् मार्ग का अपमान
- मिथ्यादृष्टि का पालन
- ईर्ष्या, द्वेष, कटुता
- धर्म के प्रति अविनय
- सच्चे साधु-संतों की निंदा
कैसे छूटता है:
- सम्यक् दर्शन की साधना
- श्रद्धा, नम्रता, क्षमा
- संत-संग
- आत्मचिंतन
- मिथ्या मान्यताओं का त्याग
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3) वेदनीय कर्म
अर्थ: जो सुख या दुःख का अनुभव कराता है। प्रकार:- सातावेदनीय – सुख देने वाला
- असातावेदनीय – दुःख देने वाला
कैसे बँधता है:
- करुणा, दया, सेवा, मधुर वचन से शुभ वेदनीय
- हिंसा, क्रोध, कठोरता, दुख देना, पीड़ा पहुँचाना से अशुभ वेदनीय
कैसे छूटता है:
- सभी जीवों के प्रति अहिंसा
- करुणा और मैत्री
- सहनशीलता
- राग-द्वेष कम करना
- समभाव में रहना
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4) मोहनीय कर्म
अर्थ: जो मोह, राग, द्वेष, आसक्ति और भ्रम पैदा करता है। यही सबसे प्रबल कर्म माना जाता है। कैसे बँधता है:- क्रोध, मान, माया, लोभ
- वस्तुओं में आसक्ति
- “मैं” और “मेरा” की भावना
- कषायों में बहना
- सत्य को न मानना, भ्रम में रहना
कैसे छूटता है:
- कषाय-जय
- वैराग्य
- क्षमा, नम्रता, सरलता, संतोष
- ध्यान
- आत्मस्वरूप का चिंतन
- वस्तुओं से ममत्व कम करना
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5) आयुष्य कर्म
अर्थ: जो जीव की आयु और भव निर्धारित करता है। कैसे बँधता है:- जीवनभर की प्रवृत्तियाँ
- शुभ या अशुभ आचरण
- जिस प्रकार की भावना और परिणाम हों
- धर्म, अधर्म, हिंसा, संयम का प्रभाव
कैसे छूटता है:
- वर्तमान जीवन को धर्ममय बनाना
- संयम
- अहिंसा
- शुद्ध भाव
- मृत्यु के समय सम्यक् भाव रखना
- परमार्थ और आत्मसाधना
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6) नाम कर्म
अर्थ: जो शरीर, रूप, अंग-उपांग, चाल, कद, रंग, इन्द्रियाँ आदि की रचना कराता है। कैसे बँधता है:- विविध प्रकार की गतिविधियाँ
- शुभ कर्मों से शुभ नामकर्म
- अशुभ प्रवृत्तियों से अशुभ नामकर्म
कैसे छूटता है:
- शुद्ध आचरण
- विनम्रता
- सेवा
- अहिंसा
- सात्त्विक जीवन
- दान, तप, संयम
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7) गोत्र कर्म
अर्थ: जो उच्च या नीच कुल, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा आदि का कारण बनता है। प्रकार:- उच्च गोत्र
- नीच गोत्र
कैसे बँधता है:
- उच्च गोत्र: विनय, नम्रता, सेवा, अहंकार-रहितता
- नीच गोत्र: अभिमान, दूसरों का तिरस्कार, घमंड, अपमान
कैसे छूटता है:
- अहंकार का त्याग
- सबके प्रति समता
- सम्मान देना
- सेवा और विनय
- परनिंदा से बचना
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8) अंतराय कर्म
अर्थ: जो शक्ति होते हुए भी दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य का उपयोग होने में बाधा डालता है। कैसे बँधता है:- दान में रोक
- किसी का हक़ छीनना
- दूसरों की प्रगति में बाधा
- लोभ, कंजूसी
- ईर्ष्या
- रोक-टोक और विघ्न डालना
कैसे छूटता है:
- उदारता
- दान
- परोपकार
- निष्काम सेवा
- दूसरों की प्रगति में सहयोग
- लोभ का त्याग
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संक्षेप में: कर्म कैसे बँधते हैं?
कर्म मुख्यतः योग और कषाय से बँधते हैं।- योग = मन, वचन, काय की प्रवृत्ति
- कषाय = क्रोध, मान, माया, लोभ
जितना अधिक राग-द्वेष, उतना अधिक कर्मबंधन। जितना अधिक संयम, क्षमा, समता, उतना कर्मक्षय।
कर्म कैसे छूटते हैं?
कर्मों का क्षय करने के मुख्य उपाय हैं:- अहिंसा
- सत्य
- अचौर्य
- ब्रह्मचर्य
- अपरिग्रह
- सम्यक् दर्शन
- सम्यक् ज्ञान
- सम्यक् चारित्र
- तप
- स्वाध्याय
- ध्यान
- प्रतिक्रमण
- क्षमा
- संयम
- वैराग्य
बहुत सरल रूप में
- अच्छे काम, दया, सेवा, संयम → शुभ कर्म बँधते हैं और धीरे-धीरे कर्म हल्के होते हैं।
- क्रोध, घमंड, छल, लोभ, हिंसा → कर्म भारी होते हैं।
- व्रत, तप, ध्यान, आत्मचिंतन → कर्म काटते हैं।
अगर आप चाहें, तो मैं इसे एक टेबल में या बहुत आसान स्कूल-स्तर की हिंदी में भी लिख सकता हूँ।