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  • author Posted by
    Jain Follower

    Explain these karmas in hindi and also add how do we get that particular karma by what activities and how to lose them

    4 months ago 58

    नीचे अष्टकर्म (आठ कर्म) का सरल हिंदी में अर्थ, वे कैसे बँधते हैं, और कैसे घटते/छूटते हैं, दिया गया है।

    1) ज्ञानावरणीय कर्म

    अर्थ: जो आत्मा के ज्ञान को ढक देता है। कैसे बँधता है:
    • झूठ बोलना
    • ज्ञान का अपमान करना
    • ज्ञानियों का अनादर करना
    • आलस्य, प्रमाद, अज्ञान में जीना
    • दूसरों के सीखने में बाधा डालना

    कैसे छूटता है:

    • स्वाध्याय
    • गुरु-सेवा
    • विनय
    • सत्य, संयम, सावधानी
    • ज्ञान के लिए श्रद्धा और परिश्रम

    ---

    2) दर्शनावरणीय कर्म

    अर्थ: जो सम्यक् दर्शन, श्रद्धा और आत्म-तत्त्व की सही पहचान को ढक देता है। कैसे बँधता है:
    • सम्यक् मार्ग का अपमान
    • मिथ्यादृष्टि का पालन
    • ईर्ष्या, द्वेष, कटुता
    • धर्म के प्रति अविनय
    • सच्चे साधु-संतों की निंदा

    कैसे छूटता है:

    • सम्यक् दर्शन की साधना
    • श्रद्धा, नम्रता, क्षमा
    • संत-संग
    • आत्मचिंतन
    • मिथ्या मान्यताओं का त्याग

    ---

    3) वेदनीय कर्म

    अर्थ: जो सुख या दुःख का अनुभव कराता है। प्रकार:
    • सातावेदनीय – सुख देने वाला
    • असातावेदनीय – दुःख देने वाला

    कैसे बँधता है:

    • करुणा, दया, सेवा, मधुर वचन से शुभ वेदनीय
    • हिंसा, क्रोध, कठोरता, दुख देना, पीड़ा पहुँचाना से अशुभ वेदनीय

    कैसे छूटता है:

    • सभी जीवों के प्रति अहिंसा
    • करुणा और मैत्री
    • सहनशीलता
    • राग-द्वेष कम करना
    • समभाव में रहना

    ---

    4) मोहनीय कर्म

    अर्थ: जो मोह, राग, द्वेष, आसक्ति और भ्रम पैदा करता है। यही सबसे प्रबल कर्म माना जाता है। कैसे बँधता है:
    • क्रोध, मान, माया, लोभ
    • वस्तुओं में आसक्ति
    • “मैं” और “मेरा” की भावना
    • कषायों में बहना
    • सत्य को न मानना, भ्रम में रहना

    कैसे छूटता है:

    • कषाय-जय
    • वैराग्य
    • क्षमा, नम्रता, सरलता, संतोष
    • ध्यान
    • आत्मस्वरूप का चिंतन
    • वस्तुओं से ममत्व कम करना

    ---

    5) आयुष्य कर्म

    अर्थ: जो जीव की आयु और भव निर्धारित करता है। कैसे बँधता है:
    • जीवनभर की प्रवृत्तियाँ
    • शुभ या अशुभ आचरण
    • जिस प्रकार की भावना और परिणाम हों
    • धर्म, अधर्म, हिंसा, संयम का प्रभाव

    कैसे छूटता है:

    • वर्तमान जीवन को धर्ममय बनाना
    • संयम
    • अहिंसा
    • शुद्ध भाव
    • मृत्यु के समय सम्यक् भाव रखना
    • परमार्थ और आत्मसाधना

    ---

    6) नाम कर्म

    अर्थ: जो शरीर, रूप, अंग-उपांग, चाल, कद, रंग, इन्द्रियाँ आदि की रचना कराता है। कैसे बँधता है:
    • विविध प्रकार की गतिविधियाँ
    • शुभ कर्मों से शुभ नामकर्म
    • अशुभ प्रवृत्तियों से अशुभ नामकर्म

    कैसे छूटता है:

    • शुद्ध आचरण
    • विनम्रता
    • सेवा
    • अहिंसा
    • सात्त्विक जीवन
    • दान, तप, संयम

    ---

    7) गोत्र कर्म

    अर्थ: जो उच्च या नीच कुल, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा आदि का कारण बनता है। प्रकार:
    • उच्च गोत्र
    • नीच गोत्र

    कैसे बँधता है:

    • उच्च गोत्र: विनय, नम्रता, सेवा, अहंकार-रहितता
    • नीच गोत्र: अभिमान, दूसरों का तिरस्कार, घमंड, अपमान

    कैसे छूटता है:

    • अहंकार का त्याग
    • सबके प्रति समता
    • सम्मान देना
    • सेवा और विनय
    • परनिंदा से बचना

    ---

    8) अंतराय कर्म

    अर्थ: जो शक्ति होते हुए भी दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य का उपयोग होने में बाधा डालता है। कैसे बँधता है:
    • दान में रोक
    • किसी का हक़ छीनना
    • दूसरों की प्रगति में बाधा
    • लोभ, कंजूसी
    • ईर्ष्या
    • रोक-टोक और विघ्न डालना

    कैसे छूटता है:

    • उदारता
    • दान
    • परोपकार
    • निष्काम सेवा
    • दूसरों की प्रगति में सहयोग
    • लोभ का त्याग

    ---

    संक्षेप में: कर्म कैसे बँधते हैं?

    कर्म मुख्यतः योग और कषाय से बँधते हैं।
    • योग = मन, वचन, काय की प्रवृत्ति
    • कषाय = क्रोध, मान, माया, लोभ

    जितना अधिक राग-द्वेष, उतना अधिक कर्मबंधन। जितना अधिक संयम, क्षमा, समता, उतना कर्मक्षय।

    कर्म कैसे छूटते हैं?

    कर्मों का क्षय करने के मुख्य उपाय हैं:
    • अहिंसा
    • सत्य
    • अचौर्य
    • ब्रह्मचर्य
    • अपरिग्रह
    • सम्यक् दर्शन
    • सम्यक् ज्ञान
    • सम्यक् चारित्र
    • तप
    • स्वाध्याय
    • ध्यान
    • प्रतिक्रमण
    • क्षमा
    • संयम
    • वैराग्य

    बहुत सरल रूप में

    • अच्छे काम, दया, सेवा, संयम → शुभ कर्म बँधते हैं और धीरे-धीरे कर्म हल्के होते हैं।
    • क्रोध, घमंड, छल, लोभ, हिंसा → कर्म भारी होते हैं।
    • व्रत, तप, ध्यान, आत्मचिंतन → कर्म काटते हैं।

    अगर आप चाहें, तो मैं इसे एक टेबल में या बहुत आसान स्कूल-स्तर की हिंदी में भी लिख सकता हूँ।

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