USAKI LOCATION JIV ME KAHA HAI
जैन दर्शन के अनुसार जीव की कोई एक भौतिक “लोकेशन” नहीं होती। जीव = आत्मा, और आत्मा अमूर्त, अरूप है।
- सामान्य अवस्था में जीव अपने कर्मबद्ध शरीर के जितने आकार का शरीर है, उतने ही विस्तार में स्थित माना जाता है।
- यानी वह सिर, हृदय या किसी एक अंग में सीमित नहीं होता।
- जैन मत में आत्मा के प्रदेश शरीर के आकार के अनुसार फैलते या सिकुड़ते हैं।
- इसलिए जीव का स्थान पूरे शरीर में व्याप्त माना जाता है, लेकिन उसका स्वरूप चेतना है।
संक्षेप में: जीव की जगह शरीर के किसी एक भाग में नहीं, बल्कि पूरे देह-परिमाण में मानी जाती है।