Man ke dosh
जैन धर्म में "मन के दोष" (मन के दोष, यानी मानसिक दोष या विकार) का गहरा विश्लेषण किया गया है। मन के दोष वे मानसिक प्रवृत्तियाँ हैं जो आत्मा को बंधन में डालती हैं और मोक्ष के मार्ग में बाधा बनती हैं। मुख्य रूप से जैन दर्शन में निम्नलिखित मन के दोषों का उल्लेख मिलता है:
- राग (आसक्ति): किसी वस्तु, व्यक्ति, या सुख की इच्छा और मोह।
- द्वेष (घृणा): किसी के प्रति शत्रुता, ईर्ष्या या नफरत।
- मोह (अज्ञानता): सत्य और असत्य का विवेक न होना, भ्रमित रहना।
- मद (अहंकार): स्वयं को श्रेष्ठ मानना, घमंड।
- माया (कपट): छल, धोखा, और दिखावा।
इन दोषों को "कषाय" (क्रोध, मान, माया, लोभ) के रूप में भी समझा जाता है:
- क्रोध (गुस्सा)
- मान (अहंकार)
- माया (छल)
- लोभ (लालच)
इन दोषों को दूर करने के उपाय:
- सम्यक् दर्शन (सही दृष्टिकोण)
- सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान)
- सम्यक् चारित्र (सही आचरण)
- तपर्य (तपस्या)
- स्वाध्याय (धार्मिक अध्ययन)
- क्षमा, मार्दव, सरलता, सत्य, संयम आदि गुणों का विकास
जैन धर्म में बताया गया है कि जब तक मन के दोष हैं, आत्मा संसार में बंधी रहती है। इन दोषों को दूर कर ही मोक्ष या परमशांति की प्राप्ति संभव है।