Ajit shanti gatha 35
अजित शांति गाथा 35:
ववगय-कम्मरय-मलं, गइं गयं सासयं विउलं ॥ 35 ॥ ( jainknowledge.com)
अर्थ: जिसके कर्मरूपी रज का मल नष्ट हो गया है, और जिसने विस्तृत, शाश्वत, श्रेष्ठ गति प्राप्त कर ली है। ( jainknowledge.com)
अगर आप चाहें, तो मैं गाथा 36 भी दे सकता हूँ।