Ajit shanti gatha 35 Arth vivechan
Ajit Shanti Gatha 35 — Arth Vivechan
मूल गाथा: “एवं तव-बल-विउलं, थुअं मए अजिअ-संति-जिण-जुअलं। ववगय-कम्मरय-मलं, गइं गयं सासयं विउलं।।” ( jainknowledge.com)
सरल अर्थ: इस प्रकार मैंने असीम तप-बल से युक्त, स्तुति के योग्य भगवान अजितनाथ और भगवान शांतिनाथ की वंदना की है। जिनके दर्शन-स्मरण से कर्म-रज का मल दूर होता है, और शाश्वत, विस्तृत मोक्ष-गति प्राप्त होती है। ( jainknowledge.com)
भावार्थ / विवेचन:
- “तव-बल-विउलं” = जिनका तप-बल महान और अपार है।
- “अजिअ-संति-जिण-जुअलं” = भगवान अजितनाथ और शांतिनाथ का युगल रूप, जिनकी आराधना की गई है।
- “ववगय-कम्मरय-मलं” = जिनकी स्तुति से कर्म-धूलि और आत्मा के ऊपर चढ़ा मल हटता है।
- “गइं गयं सासयं विउलं” = आत्मा को शाश्वत, विशाल और कल्याणकारी मोक्ष-मार्ग की प्राप्ति होती है। ( jainknowledge.com)
संक्षिप्त संदेश: यह गाथा बताती है कि अजितनाथ और शांतिनाथ की सच्चे भाव से स्तुति करने से आत्मा निर्मल होती है, कर्म बंधन ढीला पड़ता है, और मोक्ष की दिशा मिलती है। ( jainknowledge.com)
अगर आप चाहें, मैं गाथा 35 का शब्द-शब्द अर्थ भी सरल हिंदी में दे सकता हूँ।