Samyag darshan aath ang
सम्यग्दर्शन के आठ अंग ये हैं:
- निःशंकित — जिनधर्म में कोई शंका न रखना।
- निःकांक्षित — संसारिक भोगों की इच्छा न करना।
- निर्विचिकित्सा — साधु, साध्वी और धर्म के प्रति घृणा न रखना।
- अमूढदृष्टि — मिथ्या मार्ग से मोहित न होना, सही-गलत का विवेक रखना।
- उपबृंहण — गुणों की प्रशंसा करना और धर्म की वृद्धि करना।
- स्थितिकरण — धर्म से विचलित हो रहे जीव को स्थिर करना।
- वात्सल्य — साधर्मियों के प्रति प्रेम और अपनापन रखना।
- प्रभावना — जिनधर्म की प्रभावना, प्रसार और महिमा बढ़ाना।
संक्षेप में, ये आठ अंग सम्यग्दर्शन को दृढ़ और निर्मल बनाते हैं।