दिगम्बर आगमों में पृथ्वीकायिक जीव का वर्णन
दिगम्बर आगम-परंपरा में पृथ्वीकायिक जीव का वर्णन बहुत विस्तृत रूप से मिलता है। संक्षेप में—
पृथ्वीकायिक जीव कौन हैं?
जो जीव पृथ्वी-तत्त्व को शरीर के रूप में धारण करते हैं, उन्हें पृथ्वीकायिक जीव कहा जाता है। ये स्थावर जीवों के अंतर्गत आते हैं।प्रमुख विशेषताएँ
- इनका शरीर पृथ्वीमय होता है।
- ये एकेंद्रिय जीव हैं, अर्थात इनमें केवल स्पर्शनेंद्रिय होती है।
- ये अत्यंत सूक्ष्म भी हो सकते हैं और स्थूल रूप में भी पाए जाते हैं।
- इनमें स्पष्ट चलन-शक्ति नहीं होती।
- इनका असुरक्षित रूप से हिंसा करना महापाप माना गया है, इसलिए भूमि-खोदना, मिट्टी खोदना, कृषि आदि में सावधानी का विशेष विधान है।
दिगम्बर दृष्टि से वर्णन
दिगम्बर ग्रंथों में पृथ्वीकायिक जीवों को:- अनंत संख्या में बताया गया है,
- और यह कहा गया है कि वे कच्ची और पक्की मिट्टी, पत्थर, धातु, नमक, रत्न, आदि पृथ्वी-सम्बंधी पदार्थों में निवास कर सकते हैं।
प्रकार
परंपरा में पृथ्वीकायिक जीवों के दो मुख्य रूप माने जाते हैं:- साधारण पृथ्वीकायिक – अनेक जीव एक ही पिंड में समाहित माने जाते हैं।
- प्रत्येक पृथ्वीकायिक – एक शरीर में एक जीव।
आचरण में सावधानी
जैन धर्म में इनके प्रति अहिंसा के लिए:- भूमि को अनावश्यक नहीं खोदना चाहिए,
- बिना कारण मिट्टी नहीं उठानी चाहिए,
- कृषि, निर्माण, खनन आदि में जीव-दया और संयम रखना चाहिए।
सार
दिगम्बर आगमों के अनुसार पृथ्वीकायिक जीव भूमि-तत्त्व में रहने वाले, एकेंद्रिय, स्थावर और अति सूक्ष्म जीव हैं। इनकी हिंसा से बचना जैन अहिंसा का महत्वपूर्ण अंग है।यदि चाहें तो मैं इसका आगमिक ग्रंथानुसार अधिक विस्तृत वर्णन भी दे सकता हूँ।