सैनी व असैनी से क्या मतलब है ।
जैन धर्म में सैनी (संज्ञी) और असैनी (असंज्ञी) का अर्थ जीवों की मानसिक क्षमता से है।
1) सैनी / संज्ञी जीव
- जिन जीवों में मन होता है।
- जो सोच सकते हैं, समझ सकते हैं, याद रख सकते हैं और निर्णय ले सकते हैं।
- ऐसे जीवों में संज्ञा होती है, यानी जागरूकता और मानसिक चेतना।
2) असैनी / असंज्ञी जीव
- जिन जीवों में मन नहीं होता।
- वे सोच-समझकर निर्णय नहीं लेते।
- उनमें केवल स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, जैसे भूख लगना, बचना, चलना आदि।
सरल उदाहरण
- मनुष्य सामान्यतः सैनी जीव माने जाते हैं।
- कुछ पशु-पक्षी भी सैनी हो सकते हैं।
- असैनी जीव वे हैं जिनमें मन की शक्ति नहीं होती, जैसे कुछ सूक्ष्म या निम्न श्रेणी के जीव।