किसी जीव के केवल ५ प्राण होते हैं तो क्या मतलब है?
जैन धर्म में प्राण का अर्थ है जीव की जीवन-शक्तियाँ या जीवित रहने के आधार। जब कहा जाता है कि किसी जीव के केवल 5 प्राण हैं, तो उसका मतलब है कि दस प्राणों में से केवल पाँच ही उस जीव में पाए जाते हैं।
सामान्य रूप से जैन दर्शन में प्राणों की संख्या इस प्रकार मानी जाती है:
- इन्द्रिय प्राण
- शरीर प्राण
- आयु प्राण
- श्वासोच्छ्वास प्राण
- बल प्राण
अर्थात ऐसे जीव में जीवन की सीमित शक्तियाँ होती हैं। यह बताता है कि उसका चेतना-स्तर, संवेदना और क्रियाशक्ति अपेक्षाकृत कम है।
जैन वर्गीकरण में अलग-अलग जीवों में प्राणों की संख्या अलग होती है, और यही उनके विकास-स्तर को दर्शाती है। कम प्राण वाले जीवों के प्रति भी अहिंसा का पालन करना आवश्यक है, क्योंकि वे भी जीव हैं और उन्हें पीड़ा होती है।