Abhavya ko aprapt avastha
अभव्य को अप्राप्त अवस्था का अर्थ है — ऐसी आध्यात्मिक अवस्था जिसे अभव्य जीव कभी प्राप्त नहीं कर सकता।
जैन दर्शन में अभव्य वह जीव है जिसमें:
- मोक्ष प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती,
- सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र की पूर्ण प्राप्ति नहीं होती,
- और वह भविष्य में भी मोक्षमार्ग पर स्थायी रूप से नहीं आ पाता।
इसलिए अप्राप्त अवस्था से आशय उन श्रेष्ठ आत्मिक अवस्थाओं से है, जैसे:
- सम्यक् दर्शन
- केवलज्ञान
- मोक्ष
- सर्वज्ञता
- कर्मों का पूर्ण क्षय
संक्षेप में, अभव्य के लिए जो मोक्ष-योग्य, शुद्ध और पूर्ण आत्मिक स्थिति है, वह अप्राप्त रहती है।
यदि आप चाहें तो मैं इसे आगमिक भाषा में या सरल उदाहरण सहित भी समझा सकता हूँ।