baktamar 6 gatha
भक्तामर स्तोत्र की 6वीं गाथा यह है:
नित्योदितं दशनधर्मनिधिं दधानो ध्येयो भवोऽपि भवभीतिभृतां जनानाम् । त्वां स्वामिनं जिनवरं परमं प्रणम्य संसारवारिनिधितारमतिं भजामि ॥
सरल अर्थ: हे जिनवर स्वामी! आप समस्त उत्तम गुणों के भंडार हैं और सदा उदित रहने वाले हैं। जो संसार के भय से भयभीत हैं, उनके लिए आप ध्यान के योग्य हैं। आपको प्रणाम करके मैं इस संसार-सागर से पार ले जाने वाली बुद्धि की प्रार्थना करता हूँ।
भावार्थ: इस गाथा में भक्त भगवान ऋषभदेव/जिनेंद्र के गुणों का स्मरण करके संसार से मुक्ति देने वाली शुद्ध बुद्धि की याचना करता है। यह शरणागति, भक्ति और मोक्षमार्ग की भावना को प्रकट करती है।
यदि आप चाहें, मैं भक्तामर की 6वीं गाथा का शुद्ध देवनागरी पाठ या शब्दार्थ भी दे सकता हूँ।