Bhaktamber shlok 1
भक्तामर स्तोत्र का 1वाँ श्लोक:
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् । सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं युगादे- रौद्रेण योऽभ्युदयते सततं श्रियै सः ॥
अर्थ: जो व्यक्ति युगों-युगों से पूज्य भगवान जिनेन्द्र के चरण-कमलों को सम्यक् भाव से प्रणाम करता है, उसके सिर के मणियों की प्रभा से भगवान के चरणों की चमक और भी अधिक प्रकाशित होती है। ऐसे जिनेन्द्र के चरणों का निरंतर स्मरण और वंदन पापरूपी अंधकार को नष्ट करता है और कल्याण की वृद्धि करता है।
यदि आप चाहें, मैं इसके सरल हिंदी अर्थ या दूसरा श्लोक भी दे सकता हूँ।