Bhaktambar Shlok 48
भक्तामर स्तोत्र श्लोक 48
संस्कृत:
स्तोत्रस्रजं तव जिनेन्द्र! गुणैर्-निबद्धां भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्। धत्ते जनो य इह कण्ठ-गतामजस्रं तं मानतुंगमवश समुपैति लक्ष्मीः॥ 48॥ ( digjainwiki.org)
अर्थ:
हे जिनेन्द्र! मैंने भक्ति से आपके गुणों की यह स्तोत्र-माला रची है, जिसमें विविध रंगों के सुंदर पुष्पों के समान शब्द-सौंदर्य है। इस संसार में जो व्यक्ति इसे निरंतर कंठ में धारण करता है, उसे श्री-लक्ष्मी और शुभ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ( digjainwiki.org)
यदि आप चाहें, तो मैं श्लोक 48 का शब्दार्थ या सरल हिन्दी भावार्थ भी दे सकता हूँ।