Paap kitne hote hain aur कौन-कौन se
जैन धर्म में पाप के 18 भेद बताए गए हैं। इनका संक्षिप्त नाम इस प्रकार है:
- प्राणातिपात — जीवों की हिंसा करना
- मृषावाद — झूठ बोलना
- अदत्तादान — बिना दी हुई वस्तु लेना, चोरी
- मैथुन — विषय-भोग
- परिग्रह — आवश्यकता से अधिक संग्रह
- क्रोध
- मान — अहंकार
- माया — कपट
- लोभ
- राग — आसक्ति
- द्वेष — घृणा
- कलह — झगड़ा
- अभ्याख्यान — झूठा दोष लगाना
- पैशुन्य — चुगली/पीठ पीछे निंदा
- परपरिवाद — दूसरों की निंदा
- रति-अरति — पसंद-नापसंद में आसक्ति-द्वेष
- मायामृषावाद — कपटपूर्ण झूठ
- मिथ्यात्व शल्य — मिथ्या विश्वास, सम्यक् दर्शन में बाधा
सरल बात: जैन धर्म में पाप का मूल कारण हिंसा, झूठ, चोरी, विषयासक्ति, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, और मिथ्यात्व माने गए हैं।
यदि आप चाहें, मैं इन 18 पापों का बहुत आसान अर्थ भी एक-एक करके लिख सकता हूँ।