Gyaanakar with gyaan Darshan upyog
जैन दर्शन में आत्मा ज्ञानाकार मानी जाती है — अर्थात उसकी स्वभाविक प्रकृति जानने वाली है।
- ज्ञान = वस्तु को विस्तार से जानना
- दर्शन = वस्तु का सामान्य/निर्विकल्प अवलोकन
- उपयोग = आत्मा की वर्तमान चेतना-प्रवृत्ति
इसलिए कहा जाता है कि आत्मा का उपयोग ज्ञान और दर्शनरूप होता है। जब आत्मा किसी विषय को सामान्य रूप से ग्रहण करती है, वह दर्शन-उपयोग कहलाता है। जब उसी विषय को विशेष रूप से जानती है, वह ज्ञान-उपयोग कहलाता है।
संक्षेप में: आत्मा ज्ञानस्वरूप है, और उसका कार्य ज्ञान-दर्शन-उपयोग के रूप में प्रकट होता है।