जैन दर्शन में आत्मा ज्ञानाकार मानी जाती है — अर्थात उसकी स्वभाविक प्रकृति जानने वाली है। - ज्ञान = वस्तु को विस्तार से जानना - दर्शन = वस्तु का सामान्य/निर्विकल्प अवलोकन - उपयोग = आत्मा की वर्तमान चेतना-प्रवृत्ति इसलिए कहा जाता है कि आत्मा का उपयोग ज्ञा
हाँ, यह जैन दर्शन का मूल और सही भाव है।
संक्षेप में:
- आत्मा का स्वभाव चेतन है
- ज्ञान = वस्तु का विशेष, विस्तारपूर्वक और निश्चित बोध
- दर्शन = वस्तु का सामान्य, अव्यक्त, निर्विकल्प अवलोकन
- उपयोग = आत्मा की वर्तमान चेतना-प्रवृत्ति
इसलिए जैन सिद्धांत में कहा जाता है कि आत्मा का उपयोग ज्ञान और दर्शनरूप होता है। जब आत्मा किसी वस्तु को सामान्य रूप से ग्रहण करती है, तब वह दर्शन-उपयोग कहलाता है। और जब उसी वस्तु को विशेष रूप से जानती है, तब वह ज्ञान-उपयोग कहलाता है।
अर्थात:
आत्मा ज्ञानस्वरूप है, और उसकी अभिव्यक्ति ज्ञान, दर्शन तथा उपयोग के रूप में होती है।
यदि चाहें, मैं इसे शास्त्रीय भाषा में, सरल भाषा में, या प्रमाण सहित भी प्रस्तुत कर सकता हूँ।