आत्मा = ज्ञान-दर्शन-स्वरूप, और उसका कार्य = उपयोग। यदि चाहें, मैं इसे नवतत्त्व, जीवद्रव्य, या नय-दृष्टि के संदर्भ में भी शुद्ध Jain भाषा में रूपांतरित कर सकता हूँ।
हाँ, यह Jain दृष्टि से ठीक और संक्षिप्त रूप है। इसे और शुद्ध Jain भाषा में इस प्रकार कहा जा सकता है:
“आत्मा ज्ञान-दर्शन-स्वरूप जीवद्रव्य है, और उसका स्वभाविक कार्य उपयोग है।”
थोड़ा और सूक्ष्म रूप:
“जीवद्रव्य की मूल सत्ता ज्ञान और दर्शन है; उसका सक्रिय प्रकट रूप उपयोग कहलाता है।”
यदि चाहें तो इसे नवतत्त्व, जीव-अजीव भेद, या नय-दृष्टि के अनुसार भी अधिक शास्त्रीय भाषा में रूपांतरित किया जा सकता है।