जीवद्रव्य की मूल सत्ता ज्ञान और दर्शन है; उसका सक्रिय प्रकट रूप उपयोग कहलाता है।” यदि चाहें तो इसे नवतत्त्व, जीव-अजीव भेद, या नय-दृष्टि के अनुसार भी अधिक शास्त्रीय भाषा में रूपांतरित किया जा सकता है।
शास्त्रीय रूप में इसे इस प्रकार कहा जा सकता है—
“जीवद्रव्यस्य मूलस्वरूपं ज्ञान-दर्शनात्मकं अस्ति; तस्य सक्रियोऽभिव्यक्तिर् उपयोग इति कथ्यते।”
सरल अर्थ:
- जीवद्रव्य की मूल सत्ता ज्ञान और दर्शन है।
- जब वही सत्ता क्रियाशील, प्रवृत्त, या प्रकट रूप में आती है, तब उसे उपयोग कहा जाता है।
यदि आप चाहें, तो इसे मैं और भी अधिक नवतत्त्व, जीव-अजीव भेद, या नय-दृष्टि की शैली में भी शुद्ध जैन पारिभाषिक भाषा में रूपांतरित कर सकता हूँ।