द्रव्याणि तिष्ठन्ति गृहेसु
“द्रव्याणि तिष्ठन्ति गृहेषु” का सरल अर्थ है:
“द्रव्य घरों में रहते हैं” या “पदार्थ/संसाधन घर-गृहस्थी में स्थित रहते हैं।”
जैन दृष्टि से इसका भाव यह है कि द्रव्य यानी वस्तु, धन, या संसाधन स्वयं आत्मा के नहीं होते; वे संयोग से हमारे पास रहते हैं। इसलिए उनमें ममता और आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। जैन धर्म में अपरिग्रह का यही संदेश है कि वस्तुओं का उपयोग धर्मपूर्वक हो, पर उनमें बंधना नहीं चाहिए।
यदि आप चाहें, तो मैं इसका शब्दार्थ और जैन भावार्थ भी दे सकता हूँ।