nandisen bhogavali karma
मुनि नन्दीसेन और भोगावली कर्म Jain कथा में यह बताया जाता है कि भोगावली कर्म वह कर्म है जो जीव को भोग-विलास, इन्द्रिय-सुख, भोजन, वस्त्र, शय्या, और सांसारिक सुखों की अनुभूति कराता है।
मुख्य भाव:
- यह कर्म सुख देने वाला दिखता है, पर आत्मा को संसार से बाँधे रखता है।
- जब तक यह कर्म फल देता है, जीव को भोग-सामग्री और सुख की प्राप्ति होती रहती है।
- जैन दृष्टि में इन भोगों में आसक्ति ही बन्धन का कारण बनती है।
मुनि नन्दीसेन की कथा का संदेश:
- सेवा, संयम, और वैराग्य से आत्मा ऊँची होती है।
- सांसारिक भोगों में उलझना आत्मा के लिए हानिकारक है।
- जो कर्म भोग देने वाला है, वह भी अंततः संसार-चक्र को बढ़ाता है।
संक्षेप में, भोगावली कर्म का अर्थ है ऐसा कर्म जो जीव को भोगों की प्राप्ति कराता है, और मुनि नन्दीसेन की कथा इस बात को समझाती है कि भोगों से अधिक महत्वपूर्ण संयम और आत्मकल्याण है। इस कथा को आप यहाँ देख सकते हैं