Bhaktamer 6 gatha
भक्तामर स्तोत्र की 6वीं गाथा (श्वेताम्बर 48-श्लोक पाठ में) यह है: ( jainismknowledge.com)
संस्कृत: अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम, त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् । यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति, तच्चाम्रचारुकलिकानिकरैकहेतुः ॥6॥ ( jainismknowledge.com)
सरल अर्थ: हे भगवन्! मैं अल्पज्ञ हूँ, विद्वानों के लिए उपहास का विषय बनने योग्य हूँ। फिर भी आपकी भक्ति मुझे बलपूर्वक वाणी देती है। जैसे कोयल वसंत में मधुर गाती है, वैसे ही आम की सुंदर मंजरियाँ ही उसका कारण होती हैं। उसी प्रकार मेरी मधुर स्तुति का एकमात्र कारण आपकी भक्ति है। ( jainismknowledge.com)
यदि चाहो, तो मैं 6वीं गाथा का शब्दार्थ भी दे सकता हूँ।