त त वा र्थ _ सूत्र does it say that a soul can meet another soul but not like family
तत्त्वार्थ सूत्र में ऐसा सीधे नहीं कहा गया है कि “एक आत्मा दूसरी आत्मा से मिल सकती है, लेकिन परिवार की तरह नहीं।”
जैन दर्शन के अनुसार:
- हर जीव/आत्मा अलग और स्वतंत्र है।
- संसार में कर्म के कारण आत्माएँ माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, शत्रु आदि संबंधों में आती हैं।
- ये संबंध कर्मजन्य और अस्थायी होते हैं, शाश्वत नहीं।
- परम अर्थ में आत्मा अकेली है; मोक्ष में कोई पारिवारिक संबंध नहीं रहता।
इसलिए सही समझ यह है:
- व्यवहारिक स्तर पर आत्माएँ एक-दूसरे से संबंध बनाती हैं।
- निश्चय स्तर पर हर आत्मा अपनी ही शुद्ध चेतना में स्वतंत्र रहती है।
अगर आप चाहें, मैं तत्त्वार्थ सूत्र के अनुसार “जीव” और “बन्ध” का सरल अर्थ भी बता सकता हूँ।