Sarvaarth siidh k dev k baare mai bataye
सर्वार्थ सिद्ध (Sarvārth Siddh) जैन धर्म के अनुसार स्वर्ग का एक प्रमुख लोक (Heaven) है, जिसे देवलोक भी कहा जाता है। यह स्वर्गों की श्रेणी में सबसे उच्चतम (सातवाँ) स्थान है। यहाँ के देवों को 'सर्वार्थसिद्धि के देव' कहा जाता है।
सर्वार्थ सिद्ध लोक के बारे में:
- जैन धर्म के अनुसार, सम्यक् चारित्र, सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान से युक्त पुण्य आत्माएँ मरने के बाद सर्वार्थ सिद्ध लोक में जन्म ले सकती हैं।
- 'सर्वार्थ' का अर्थ है 'सभी प्रकार की इच्छाएँ', और 'सिद्ध' का अर्थ है 'पूर्ण होना'। अर्थात यहाँ पर जन्म लेने वाले देवों की सभी इच्छाएँ स्वतः ही पूरी हो जाती हैं।
- यह लोक सोलहवाँ स्वर्ग है और सबसे उच्चतम स्वर्ग माना गया है।
- यहाँ के देव बहुत ही सुखी, दीर्घायु और अत्यंत उज्ज्वल होते हैं।
सर्वार्थ सिद्ध देवों के लक्षण:
- इन देवों की आयु बहुत लंबी होती है (33 सागर वर्ष तक)।
- इनका शरीर अत्यंत कोमल, सुंदर और प्रकाशमान होता है।
- इन्हें किसी भी प्रकार की शारीरिक, मानसिक या प्राकृतिक कष्ट नहीं होते।
- इनकी सभी इच्छाएँ बिना किसी प्रयास के स्वतः पूर्ण हो जाती हैं।
महत्त्व:
- जैन धर्म में मोक्ष के बाद सर्वोच्च अवस्था तो सिद्धत्व (मोक्ष) ही मानी गई है, लेकिन सर्वार्थ सिद्ध लोक भी पुण्य आत्माओं के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
- यहाँ जन्म लेना अत्यंत पुण्य का फल होता है, परंतु यहाँ से भी पुनः संसार में जन्म लेना संभव है, क्योंकि यह मोक्ष नहीं है।
संदर्भ:
- तत्त्वार्थ सूत्र (तत्त्वार्थाधिगम सूत्र), अध्याय 4
- जैन आगम साहित्य
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