चित्त क्या है
जैन दर्शन में चित्त का अर्थ है आत्मा की वह चेतन-शक्ति जिसके माध्यम से ज्ञान, स्मरण, विचार, कल्पना, ध्यान और संकल्प आदि होते हैं।
सरल शब्दों में:
- चित्त = मन की भीतरी कार्य-शक्ति
- यह आत्मा का सूक्ष्म उपयोग माना जाता है
- इसके द्वारा विचार आते हैं, स्मृति होती है, और ध्यान लगता है
जैन दृष्टि से यह समझना आवश्यक है कि:
- आत्मा स्वयं शुद्ध चैतन्य है
- मन, वचन, और काय उसके योग हैं
- चित्त मन से जुड़ी हुई वह अवस्था है जिसमें संकल्प-विकल्प और मानसिक वृत्तियाँ चलती हैं
- जब चित्त शुद्ध होता है, तब सम्यक् ज्ञान, सम्यक् ध्यान और आत्म-उन्नति में सहायता मिलती है
- जब चित्त अशांत होता है, तब राग, द्वेष, मोह बढ़ते हैं
अतः जैन धर्म में चित्त को संयम, ध्यान, स्वाध्याय और आत्मचिंतन द्वारा शुद्ध करना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।
संक्षेप में: चित्त वह मानसिक-चेतन प्रवाह है जो आत्मा की अनुभूति, विचार और ध्यान से जुड़ा होता है।