Jeev kitnee prakar ka hai
जैन धर्म में जीव अनेक प्रकार के होते हैं। उन्हें अलग-अलग दृष्टि से समझाया जाता है:
1) मुख्य भेद
- संसारी जीव — जो जन्म-मरण के चक्र में हैं
- मुक्त जीव (सिद्ध जीव) — जो कर्मों से मुक्त हो चुके हैं
2) इंद्रियों के आधार पर
संसारी जीव 5 प्रकार के माने जाते हैं:- एकेन्द्रिय — एक इंद्रिय वाले
- द्वीन्द्रिय — दो इंद्रिय वाले
- त्रीन्द्रिय — तीन इंद्रिय वाले
- चतुरिन्द्रिय — चार इंद्रिय वाले
- पंचेन्द्रिय — पाँच इंद्रिय वाले
3) जैन दर्शन में संक्षेप
- एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक जीवों के भेद मिलते हैं
- कुल मिलाकर जीवों की अनेक श्रेणियाँ बताई गई हैं, और शास्त्रों में इन्हें जीवस्थान के रूप में भी समझाया गया है
अगर आप चाहें तो मैं “जीव के 14 स्थान” भी बहुत सरल भाषा में बता सकता हूँ।